मंगलवार, 10 जनवरी 2017

विद्यार्थी जीवन में चिंता व्यर्थ

Posted by बेनामी
कहा जाता है कोई दूसरा विकार या प्रहार इंसान का कुछ बिगाड़ पाये या नहीं लेकिन 'चिंता' वह है जो इंसान को खुर्द कर खा जाती है अर्थात् इंसान को अन्दर से बिल्कुल खोखला कर देती है जिससे अपनी मानसिक और शारीरिक दोनों शक्तियां खो बैठता है। लेकिन फिर भी चिंता इंसान को किसी न किसी रूप में घेरे रहती है। या फिर कहें कि हम यह जानते हुए कि चिंता खतरनाक है फिर भी हम इसे अपने दिमाग में लेकर बैठे रहते हैं। आपने बहुत से लोगों को यह कहते हुए सुना होगा कि - हम चिंता करते नहीं बल्कि हो जाती है। क्या वास्तविकता यही है कि कोई व्यक्ति चिंता करता नहीं बल्कि हो जाती है।तो समझ लीजिए अपनी चिंता के जिम्मेदार हम खुद हैं, कोई और नहीं। क्योंकि इसके पीछे हमारी कुछ न कुछ कमजोरी अवश्य होती है चाहे इसे हम अपनी भूल कहें। लेकिन क्या कभी आपने विचार किया कि चिंता की मूल वजह क्या है? शायद नहीं। चिंता का मूल कारण यही रहता है कि हम यह नहीं समझते कि हमारी चिंता की वजह क्या है - बस यही सोच लेते हैं कि चिंता होना तो लाजमी है। चिंता के कुछ मुख्य कारण यह भी होते हैं जो हमारी वर्तमान से उठकर भविष्य में नजर चली जाती है जैसे - कौन जाने क्या होगा। , क्या मालूम इस कार्य का क्या नतीजा रहेगा। आदि बातें अब दूसरी तरफ एक विद्यार्थी भी स्वयं को मामूली बातों को लेकर चिंतित रहता है जैसे - मेरा पेपर कितना कठिन होगा।, मेरा परीक्षा परिणाम कैसा रहेगा।, क्या मैं सफल हो पाऊंगा या नहीं बस यही बातें हैं जो हमारी चिंता का कारण बनी रहती है। बल्कि इन बातों को वर्तमान समय में सोचने का हमें कोई फायदा भी नहीं होता और ना ही इनकी जरूरत होती है। क्योंकि यह सब हमारे हाथ में अर्थात् हमारी मेहनत पर निर्भर करता है। कि हम किसी कार्य को कैसे ओर कहाँ तक संभव बना सकते हैं। क्योंकि हमें उस वक्त चिंता की नहीं बल्कि चिंतन - मनन की जरूरत होती है। हम इस बात को अच्छे से समझते हैं कि गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि हमारा कार्य केवल कर्म करना है न कि फल की इच्छा/चिंता करना। लेकिन यह निश्चित है कि यदि हम कर्म करने की बजाय पहले उसके फल और नतीजे के बारे में सोचेंगे तो चिंता होगी ही। जिस वजह से हम अपना कार्य शायद ही पूरा कर पायेंगे जो कि बढ़ती चिंता का कारण बन जाएगा। एक बात गहराई से सोचिये कि क्या हम किसी बात की चिंता करके उसका निवारण कर लेंगे?, क्या विद्यार्थी परिणाम को चिंता के बल पर बेहतर बना लेगा शायद नहीं। क्योंकि इन सबके लिए हमें चिंता नहीं बल्कि मेहनत करनी होगी चिंता क्यों है इस बात की जड़ तक जाना होगा। तभी हम चिंता से मुक्त रह सकते हैं। क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति का चिंता से दूर रहना बेहद ज़रूरी है वो इसलिए क्योंकि पहले हमें अपनी इच्छा और कार्य की चिंता होती है लेकिन बाद में यह चिंता को कैसे दूर करें इस चिंता में बदल जाती है अर्थात् मानसिक तनाव। इसलिए चिंता मुक्त होने के दो रास्ते हैं - मेहनत और ध्यान - ध्यान में भगवान। प्रिय विद्यार्थियो आपको यह लेख कैसा लगा अपनी राय जरूर लिखें।
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सोमवार, 9 जनवरी 2017

विद्यार्थी की स्वयं शक्ति

Posted by बेनामी
प्रिय विद्यार्थियो इस लेख को सही रूप में समझने के लिए आपको इसकी गहराई में जाना होगा वो गहराई जिसे आप लिखे शब्दों की बजाय अपने मन से समझेंगे। हम इस बात को बहुत अच्छे से जानते हैं कि मानव एक ऐसी शक्ति है जो कि किसी कार्य और अपने सपनों को पूरा करने की मन से ठान ले तो उसमें वह ताकत है कि वह उसे पूरा कर सकता है। बस जरूरत है तो सिर्फ और सिर्फ स्वयं के अन्त: मन की आवाज सुनने की जो हमारे अन्दर अपनी ताकत का बखान करने में लगी है। जी हाँ प्रिय विद्यार्थियो यहां बात की जा रही है हमारी उस अंदरूनी ताकत की जिसके बारे में जानते हुए भी हम शायद भूल गए हैं या फिर अनदेखा कर रहे हैं। क्या आपको अंदाजा है हमारी उस अंदरूनी शक्ति उस आग का जिसका प्रयोग करके, जिसे पहचान कर हम अपने भविष्य को उस ऊंचाई तक पहुंचा सकते हैं जिसे कभी सोचा नहीं था। लेकिन वह अंदरूनी शक्ति धीरे - धीरे कम होती जा रही है वो सिर्फ इस वजह से कि हम अपने आप को भूल चुके हैं अर्थात् हम सिर्फ उसे देख रहे हैं जो हमारी जिन्दगी में अपने आप हो रहा है बस उसी में जीये जा रहे हैं। यहां तक कि कोई मतलब नहीं अच्छा है या बुरा बस झेले जा रहे हैं। बस यह सोचकर कि नसीब ही ऐसा है। लेकिन वास्तविकता तो यह है कि सब कुछ सुधार किया जा सकता है यदि ठान लिया जाए । लेकिन इस बात के भरोसे हाथ पर हाथ धरे मत बैठ जाना कि कभी चमत्कार होगा। क्योंकि यदि भविष्य बदलना है तो हमें स्वयं को उठ खड़ा होना होगा और कुछ करने के लिए आगे बढ़ना होगा। और यह ताकत हम सब के अन्दर ईश्वर ने बनाई है बस उसे विचारना है। अब मुद्दे पर पहुंचते हैं बात विद्यार्थी जीवन की हो रही है। तो आपने कभी यह तो जरूर सुना होगा कि - आज का विद्यार्थी कल का गौरव/भविष्य है। लेकिन इन्हीं बातों को हमने कभी जांचा/परखा कि यह क्यों और किसके लिए कहा जाता रहा है। शायद नहीं - क्योंकि सुनते ही ऐसा महसूस होता है मानो किसी दूसरे के लिए कहा जा रहा है। वो इसलिए क्योंकि हमारा ध्यान सीधे तौर पर अपनी कमजोरीयों पर जाता है, विपरीत हमारी अंदरूनी शक्ति और योग्यता के। हम उस चीज़ को देखते हैं जो दूसरे की मजबूती है परन्तु हमारी वह कमजोरी है, बस इतना सब देखकर हम अपनी प्रत्येक ताकत को गिरा देते हैं और खुद ही स्वयं को कमजोर साबित कर देते हैं। सही माना जाए तो विद्यार्थी जीवन एक ऐसा जीवन है, जिसका सब कुछ विद्यार्थी के स्वयं के हाथ में होता है अर्थात् यहां तक कि हमारा सम्पूर्ण भविष्य। तो यहां से हम अपने जीवन को उस रास्ते और मंजिल तक पहुँचा सकते हैं जहां हम खुद जाना चाहते हैं। बस बात सिर्फ अपनी अंदरूनी शक्ति को याद रखने की है वो ये - क्या कभी आपने सोचा कि यदि कल कोई बड़े से बड़ा अधिकारी बनने वाला है तो वो कौन है - तो वो है आज का विद्यार्थी अर्थात् हम स्वयं ही वो है जो कल स्कूल,कॅालेज से निकलकर वहां तक पहुंचने वाला है। बस हमें जरुरत है तो केवल अपने अंदर झांकने की केवल सोच बदलने की कि हमें कुछ बनना है और हम बन भी सकते हैं। हमें सिर्फ मेहनत करनी है, और हम जैसी मेहनत करेंगे हमें उतना फल मिलने वाला है। अब आप इस बात को अच्छे से समझ गये होंगे कि हम स्वयं को चाहे वैसा बना सकते हैं - नाज़ुक भी और बड़ा भी फैसला हमें ही करना है। लेकिन याद यह भी रखना होगा कि हम स्वयं के हौसले को न गिरायें जब तक सफलता न मिले चाहे हम बार- बार असफल क्यों न हो गए हों। इसलिए इन। बातों पर भी विचार कर लेना सही रहेगा कि यदि हम किसी प्रकार असफल रहते है तो क्या - •हमारी योग्यता में कोई कमी आती है। •क्या हमें सफलता के प्रयास दुबारा नहीं करने दिया जाता। •क्या हमारी बुद्धि में भरा ज्ञान खत्म हो जाता है। नहीं ऐसा कभी नहीं होता इसलिए हमें इन बातों की चिंता किये बगैर सिर्फ मेहनत करते रहना ही लाभ देगा। और अवश्य हमारी मेहनत काम आयेगी। प्रिय विद्यार्थियो आपको यह लेख कैसा लगा अपनी राय जरूर लिखें।
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शनिवार, 7 जनवरी 2017

विद्यार्थी जीवन में पुस्तकों का महत्व

Posted by बेनामी
कहा जाता है विद्यार्थी जीवन में पुस्तक ही विद्यार्थी की सबसे अच्छी दोस्त है। पुस्तकें वह साधन है जो केवल विद्यार्थी के लिए ही नहीं बल्कि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। लेकिन यह जरूरी नहीं कि पुस्तक केवल स्कूल से संबंधित हो बल्कि पुस्तकें वे भी जो प्रेरणा से भरपूर हो, जो हमें अपने जीवन में बहुत कुछ सीखा जाए। और इस प्रकार की पुस्तकों की कहीं कोई कमी नहीं। हम जो चाहें उस तरह की अच्छी पुस्तक पढ़ सकते हैं जो कि बदले में हमसे रत्ती भर भी नहीं मांगती उलटा हमारी बुद्धि और ताकत का प्रसार ही करती हैं। विद्यार्थियो पुस्तकें केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं बल्कि पुस्तक तो हमारी जीवन प्रेरणा का भंडार है जो हमारे अन्दर मानवता रूपी गुण को भर देती है। पुस्तकों में वो ताकत है जिन्हें पढ़ने पर व्यक्ति के अन्दर शिखर तक पहुंचने की तपन पैदा होती है। व्यक्ति के जीवन में पुस्तकें ही सुन्दर मानव सभ्यता का आधार है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति और विद्यार्थी जीवन में यह सर्वश्रेष्ठ लाभ सिद्ध होगा कि हम अच्छी और प्रेरणादायक पुस्तकें पढ़ें और उन्हें अपने जीवन में उतारें।
हमें अपने जीवन में अन्य पुस्तकों के साथ साथ इन चार पुस्तकों को अवश्य पढ़ना चाहिए जो कि प्रेरणा का काफी अच्छा स्रोत है। जिन्हें आप यहां से पीडिएफ में डाउनलोड कर सकते हैं:-


1. The secret/रहस्य -

यह पुस्तक रॅान्डा बर्न द्वारा लिखी गई है। जिसका pdf इस लिंक द्वारा डाउनलोड कर सकते हैं

2. Chanakya niti/चाणक्य नीति -

3. You can win/जीत आपकी -

यह पुस्तक शिव खेड़ा जी द्वारा लिखी गई है जिसका मकसद व्यक्ति के जीवन को सफल बनाना है।

4. Aapka bhwisy aapke hath me/आपका भविष्य आपके हाथ में -

इस पुस्तक के लेखक डॉ ए पी जे अब्दुल कलाम जी हैं।
हमें खेद है कि अंतिम दो पुस्तकें पीडीएफ में उपलब्ध न होने की वजह से लिंक नहीं डाला गया है।




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शुक्रवार, 6 जनवरी 2017

विद्यार्थी जीवन में कर्तव्य पालन

Posted by बेनामी
मनुष्य जीवन ऐसा है जहां हमें अपने प्रत्येक कर्तव्य को बखूबी निभाना बेहद जरूरी होता है। लेकिन मनुष्य जीवन जहां कर्तव्यों का बने रहना और उनका पालन करना अत्यंत आवश्यक होता है क्योंकि उनके बिना हम जिन्दगी के मूल मकसद तक नहीं पहुंच सकते, और ना ही अपने जीवन को संवार सकते हैं। लेकिन इन्हीं कर्तव्यों का प्रत्येक व्यक्ति के साथ विद्यार्थी जीवन में कितना महत्व है इस बात को भी समझना होगा। सही मायनों में हमारे कर्तव्यों की शुरुआत बचपन से ही हो जाती है लेकिन विद्यार्थी जीवन ऐसा है जहां हमें अपने मूल कर्तव्यों की समझ पड़ती है। वहीं से ही हमारे सम्पूर्ण जीवन की नींव तैयार होती है और पूर्ण मनुष्य जीवन का चरित्र निर्माण होता है। अब वास्तविकता यह है कि जैसी हमारे जीवन की नींव होगी वैसे ही हम स्वयं से -राष्ट्र तक के कर्तव्य पालन रूपी भावों को समझ सकेंगे। जहां तक विद्यार्थी जीवन में मूल कर्तव्य बनता है अच्छी शिक्षा ग्रहण करना वहीं सम्पूर्ण मानव जीवन का कर्तव्य बनता है कि हम खुद की जिम्मेदारी खुद ही लें। क्योंकि हमें अच्छी मानवता की शुरुआत स्वयं से ही करनी होगी। लेकिन अब सवाल यह उठता है कि क्या हम बड़ी और अधिक से अधिक शिक्षा पाकर अपने कर्तव्यों को भली प्रकार समझ सकते हैं? शायद नहीं अवश्य हम शिक्षा से रोजगार प्राप्त कर लें ।लेकिन हमें अपने कर्तव्यों को जानने और उनका पालन करने के लिए कर्तव्यनिष्ठ और वचनबद्ध होना पड़ेगा। इतना ही नहीं बल्कि हमें दूसरों के कर्तव्यों की ओर झांकने ओर आदेश देने की बजाय स्वयं के कर्तव्यों को निहारना होगा। तभी हम अपने जीवन के मकसद तक पहुँच सकते हैं। कर्तव्य का स्तर यहां तक ही नहीं कि हम केवल अपनी महत्वपूर्ण जरूरतों को पूरा करने के लिए कार्य करें। बल्कि हम विचार करें कि हम दूसरों के लिए और समाज के लिए अपना हाथ कहाँ तक बढ़ा सकते हैं। इन सब बातों को हम केवल मात्र पुस्तकों में पढ़कर नहीं सीख सकते बल्कि इनके लिए हमें दूसरे लोगों और बाहरी दुनिया को पैनी नज़र से ताकना होगा यहां तक कि हमें बहुत पीछे हमारे पूर्वजों के साथ भगवान राम और आज्ञापालन श्रवण कुमार के जीवन का स्मरण करना होगा। एक नजर में देखे तो बचपन में हमारा कर्तव्य केवल माता पिता की आज्ञा का पालन करने तक सीमित है लेकिन विद्यार्थी जीवन में पैर रखने के पश्चात गुरु ओर बड़ों और धीरे धीरे समाज और राष्ट्र के प्रति कर्तव्यों का पालन करना आवश्यक होता है। इतना ही नहीं हमारे जीवन में और भी बहुत छोटे - छोटे कर्तव्य बनते हैं जिनका पैमाना हमारे भविष्य के लिए बड़ा होता है। अब चाहे वह हमारे घर,विद्यालय की साफ - सफाई से लेकर दूसरों की मदद करने तक क्यों न हो। बल्कि यहीं से हमारी पहचान एक अच्छे चरित्रवान नागरिक के रूप में होती है। इसलिए यह अतिआवश्यक है कि हम अपने अपने जीवन के प्रत्येक कर्तव्य को समझें और उन्हे पूरा कर कर्तव्यपालक के रुप में पहचान बनायें। प्रिय विद्यार्थियो आपको यह लेख कैसा लगा कॅामेन्ट बॅाक्स में लिखकर बतायें
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गुरुवार, 5 जनवरी 2017

विद्यार्थी जीवन और परिस्थितियां

Posted by बेनामी
जिन्दगी इतनी सरल भी नहीं कि हम इसका प्रत्येक पल हंस कर बितायें । लेकिन इतनी भी कठिन नहीं कि इसे गंभीर समझ कर जीना ही छोड़ दें और घुटन महसूस करें। जिन्दगी का एक सिद्धांत यह भी है कि यह शुरूआत में जितनी जटिल है आने वाले समय में हम उसे उतना ही अधिक सफल बना सकेंगे लेकिन इससे पहले हमें इसके गहरे राज(secret) को जानना होगा। इसे प्रत्येक व्यक्ति बड़ी आसानी से समझ सकता है जो कहीं ओर नहीं बल्कि हमारे अन्दर ही छिपा है। बड़ा ही रोचक तथ्य है कि कुछ लोग कठिनाईयों और तंग जिन्दगी से उभर कर स्वयं को मजबूती पर ला खड़ा करते हैं, कुछ ऐसे भी जो नाज़ुक परिस्थितियों में भी स्वयं को संभाले रखते हैं उनके प्रत्येक निराशा पर हल्की सी मुस्कुराहट पर्दा डाले रहती है। बस वही मुस्कुराहट जिससे वे जिन्दगी का वर्णन सरल शब्दों में करने लगते हैं अर्थात् सफलता की सीढ़ी चढ़ते हैं। अवश्य आज जो परिस्थितियां है जो हमारी कठिनाईयाँ,कमजोरियां है वो कल भी रहे कोई जरूरी नहीं। लेकिन उनसे सीखना जरूरी है क्योंकि वही है जो हमें जीवन के महान रास्ते पर लेकर जाने वाली है। महत्वपूर्ण बात तो यह है कि हम उन परिस्थितियों को किस रूप में आंकते हैं। सही कहा जाए तो अधिकतम हम इन्हें नकारात्मक रूप में देखते हैं। तो वे परिस्थितियां वैसी ही बन जाती हैं जैसा हम उन्हें स्वीकारते हैं और उनके दबाव में रहते हैं। यही कारण रहता है कि हम स्वयं को कमजोर और नीची सोच का बना लेते हैं।
ईश्वर ने हमें सुन्दर शरीर और आत्मा दी है वो इसलिए ताकि हम अपने और समाज के लिए कुछ अच्छा करें, ऐसा नहीं कि हम अपने कठिनाईयों नाम मात्र की असफलता का आरोप ईश्वर पर थोपें। यदि ऐसा करते हैं तो शायद हम जीवन का सही महत्व नहीं समझ पायें हैं और साथ ही हमने अपने कर्तव्य से भागना शुरू कर दिया है।
अब दूसरी तरफ बात करें विद्यार्थी जीवन की तो यहां बाधाएं आना मामूली बात है तभी हम जीवन को संवारना चाहेंगे। प्रत्येक विद्यार्थी के जीवन में हर कदम पर परिस्थितियां कुछ अलग अंदाज बना ही लेतीं है। कभी असफलता का डर, आर्थिक स्थिति में उतार - चढ़ाव या फिर परीक्षा और उसकी तैयारी को लेकर कोई न कोई नई स्थिति तैयार। लेकिन क्या हमें इन परिस्थितियों में घबरा जाना चाहिए, अपने लक्ष्य को छोड़ देना चाहिए -नहीं। इसके विपरीत यही ठीक रहेगा कि हम ऐसे समय में संयंम और शांत चित्त से काम ले। इसलिए क्योंकि यही वे परिस्थितियां हैं जिनसे हमें बहुत कुछ सीखने को मिलेगा, यहीं से हमारे अंदर वह जोश पैदा होगा जहाँ से हम अपनी कमजोरी और बाधाओं को चीरकर आगे बढ़ना चाहेंगे। तभी हम अपने भविष्य को शिखर पर पहुँचा सकते हैं। सोचिये यदि हम शुरुआत से ही ऐशोआराम से भरा जीवन जीने लगे और किसी भी कार्य को बाधित समझ कर जरूरी न समझें तो भविष्य में किसी कठिनाई का सामना कैसे कर पायेंगे, कहाँ तक सफल होंगे और वह आराम से भरी जिंदगी कब तक साथ देने वाली है - इसकी कोई निश्चितता नहीं। थोड़ा गहराई में जायें तो ज्यादातर वे बच्चे पढ़ाई में अव्वल रहते हैं और सफलता छूते हैं -जिन्होंने परिवार में आर्थिक तंगी देखी हो, जिन्होंने जीवन की कठोरता को सहा हो। बजाय उन लोगों के जिन्होंने केवल ऐशोआराम को जिन्दगी समझा हो। शुरूआती दौर की कठिनाईयां ही जिन्दगी को करीब से देखने का मौका देती है। वहीं से ही भविष्य की सफलता का असली आनंद समझ आता है।
प्रिय विद्यार्थीयो आपको इस लेख के साथ साथ पहले के लेख कैसे लगे हमें कॅामेंट बॅाक्स में लिखकर बतायें । साथ ही आप भविष्य में किस संबंध में जानकारी चाहते हैं जरूर लिखें
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बुधवार, 4 जनवरी 2017

विद्यार्थी जीवन और राजनीति

Posted by बेनामी
विद्यार्थीयो यह लेख विद्यार्थी जीवन में पढ़ाई और विद्यार्थी जीवन में राजनीति से संबंधित है। इसलिए सबसे पहले हमें यह जान लेना चाहिए कि विद्यार्थी जीवन और राजनीति पर यदि बहस छेड़ दी जाए तो इस बहस का अंत अर्थात् नतीजा लटक कर रह जाएगा। क्यों कि यह बहस बहुत हद तक एक दूसरे पक्ष को सही भी ठहरायेगी और उतना गलत भी अर्थात् सवाल जस का तस खड़ा रहेगा कि क्या विद्यार्थी जीवन से ही राजनीति से जुड़ जाना सही है या गलत?
लेकिन वास्तविकता तो यह है कि आज प्रत्येक व्यक्ति को अपने राष्ट्र हितों और राजनीति
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मंगलवार, 3 जनवरी 2017

विद्यार्थी जीवन और स्वास्थ्य

Posted by बेनामी
प्रिय विद्यार्थियो कहा जाता है विद्यार्थी जीवन में सबसे महत्वपूर्ण कार्य है तो वह है पढ़ाई । लेकिन क्या हम जानते हैं पढ़ाई के साथ - साथ स्वयं को स्वस्थ रखना कितना जरूरी है। हमने अपने जीवन में इस बात को कहीं न कहीं अवश्य पढ़ा या सुना है कि - पहला सुख~निरोगी काया अर्थात् प्रत्येक मनुष्य जीवन में यदि सबसे बड़ा और प्रथम सुख है तो तन से स्वस्थ रहना है । क्योंकि चेहरे पर मुसकान और अपने कार्य में रुचि केवल स्वास्थ्य से भरपूर व्यक्ति ही दिखा सकता है। तो अब हम इस बात को अच्छे से समझ सकते हैं कि एक विद्यार्थी जीवन में आगे बढ़ते रहने के लिए स्वस्थ तन और स्वस्थचित्त कितना अहमियत रखता है।
स्पष्ट रूप में कहें तो एक विद्यार्थी अस्वस्थ और चिंता से घिरा रहकर अपने जीवन को सफल नहीं बना सकता चाहे वह अमीर घराने से क्यों न हो, इसके विपरीत यदि विद्यार्थी तन से स्वस्थ है तो उसका बाहरी कठिनाईयों और बाधाओं की ओर ध्यान न होकर केवल अपने जीवन को सफल बनाने की ओर है।
देखिए वैसे तो स्वस्थ रहना हमारेहाथ में नहीं है और ना ही हम अस्वस्थ व्यक्ति को स्वयं का दोषी कह सकते। लेकिन फिर भी हमारी जिम्मेदारी बनती है कि हम अपने शरीर का ख्याल करें। बहुत बार ऐसा भी होता है कि हम मामूली शारीरिक दिक्कत को बहुत हल्के में लेते हैं और उसका ईलाज करवाने में लापरवाही करते हैं जो कि बाद में हमारे लिए बड़ी समस्या बन जाती है। बात करें विद्यार्थी की तो तब तक विद्यार्थी स्वयं को पढ़ाई से नहीं जोड़ पाता जब तक उसका स्वास्थ्य अच्छा नहीं है। लेकिन विद्यार्थी जीवन में हमारी अस्वस्थता के कुछ कारण ऐसे भी होते हैं जहां हम इसके खुद जिम्मेदार होते हैं। शायद यह बात थोड़ी अस्ंतुष्ट करने वाली लगी होगी परन्तु वास्तव में ऐसा होता है। वो इसलिए क्योंकि हम स्वयं पर अपनी पढ़ाई का बोझ अत्यधिक बना लेते हैं कहने का मतलब हम अपना अधिकतम समय पढ़ाई करने में बिताते हैं या किताबी कीड़ा बन जाते हैं। तो वहाँ हम अपनी दिनचर्या का बिल्कुल भी ख्याल नहीं करते अर्थात खाना पीना, उठना - बैठना, खेलना - कूदना। इन सब कार्यों का कोई निश्चित समय नहीं देते और सब जरूरी कार्यों को भूलकर केवल पढ़ाई ओर पढ़ाई । ऐसे में हमारी दिनचर्या बेहद खराब सी हो जाती है जिसका सीधा असर हमारे स्वास्थ्य पर पड़ता है जिसका हम पहले ख्याल नहीं कर पाते लेकिन बाद में हमें कठिनाई झेलनी पड़ती है। इसलिए बहुत जरूरी है कि हम अपनी पढ़ाई को महत्व देते रहे लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखना छोड़ दें । इसलिए हमें अपनी दिनचर्या का पूर्ण रूप से ख्याल करना होगा। हमें चाहिए कि हम अपनी पढ़ाई के साथ दिनचर्या में निम्न बातों का ध्यान रखें :-
• सुबह जल्दी उठना
• नित्य व्यायाम करना चाहिए
• सुबह सैर के लिए जाना
• समय पर भोजन करना
• शरीर की साफ सफाई
आदि बातों का ध्यान रखकर हम बहुत हद तक स्वयं को शारीरिक रूप से स्वस्थ बनाए रख सकते हैं। यहां अंत में यह कहा जाए तो ठीक रहेगा कि हमें अपनी शरीर की अस्वस्थता को मन तक नहीं पहुँचने देना चाहिए। क्योंकि जब तक हमारा मन स्वस्थ है तब तक हमारा बीमारी कुछ नहीं बिगाड़ सकती इसलिए बीमारी से मत भागीये बल्कि बीमारी को भगाईये।
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रविवार, 1 जनवरी 2017

विद्यार्थी जीवन में इंटरनेट का महत्व

Posted by बेनामी
आज यदि बात की जाए समाज में प्रत्येक व्यक्ति की जीवन प्रणाली में तेजी से हो रहे बदलाव की तो इसमें एक बड़ा कदम इंटरनेट का रहा है। समय में नये - नये बदलावों के साथ व्यक्तिगत जीवन में इंटरनेट का महत्व बढ़ता जा रहा है। आज इंटरनेट प्रत्येक व्यक्ति के जीवन की जरूरत बन चुका है और यही वजह है कि इंटरनेट का महत्व और उपयोग विद्यार्थी जीवन के लिए बढ़ता जा रहा है। ऐसे में विद्यार्थी के लिए इंटरनेट का इस्तेमाल गलत ठहराना शायद उचित नहीं होगा। क्योंकि इंटरनेट आज इस स्तर तक पहुँच गया है जहां समाज में हर वर्ग, व्यक्ति और विद्यार्थी का इससे जुड़ना बेहद जरूरी है। इसके बिना व्यक्ति अपने बहुत से कार्यों को पूरा नहीं कर पाता। बात करें विद्यार्थी जीवन की तो आज इंटरनेट ने विद्यार्थी की बहुत हद तक मदद की है जिससे विद्यार्थी की बहुत सी कठिनाइयां सरलता में बदल गई है।
लेकिन हमें इंटरनेट के महत्व को समझने के लिए इसे उपयोगिता के आधार पर दो बिंदुओं से समझना होगा ।
• इंटरनेट का सदुपयोग
• इंटरनेट का दुरुपयोग

विद्यार्थी जीवन में यदि इंटरनेट का सही तरीके से इस्तेमाल किया जाये तो यह विद्यार्थी के लिए बहुत मददगार सिद्ध होता है। इंटरनेट के द्वारा हम अपने विद्यार्थी जीवन में शिक्षा से जुड़ी प्रत्येक जानकारी इंटरनेट द्वारा प्राप्त कर सकते हैं यहां तक कि अपना परीक्षा परिणाम और रोजगार से संबंधित जानकारी भी घर बैठे जान सकते हैं। इतना ही नहीं आज इंटरनेट के माध्यम से स्कूलों में पढ़ाई से संबंधित तकनीकों में बहुत अच्छा बदलाव हुआ है। जिससे शिक्षा का स्तर सुधर रहा है। विद्यार्थी अपने पढ़ाई संबंधी फॅार्म और प्रमाण पत्र बहुत आसानी से भरवा सकता है जो कि इंटरनेट के माध्यम से संभव हुआ है। जिससे विद्यार्थी का समय और पैसा दोनों में बचत होती है। इसके साथ साथ इंटरनेट के माध्यम से हम प्रेरणा और पढ़ाई संबंधी पुस्तकें पढ़ सकते हैं और अच्छी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। सही शब्दों में कहें तो हम इंटरनेट का सदुपयोग जरुरत के अनुसार उचित प्रयोग कर के कर सकते हैं।
- इंटरनेट के इन सभी फायदों के अलावा यदि हम इंटरनेट से विद्यार्थी को होने वाले नुकसान के बारे में कहें तो ऐसा नहीं है कि इंटरनेट अपने आप में सही नहीं है - नहीं। बल्कि इसके कुछ दुरुपयोग हैं जिन्हें व्यक्ति स्वयं अपनाकर इंटरनेट को स्वयं के लिए नुकसानदायक बना लेता है। वहीं इसका थोड़ा सा भी गलत उपयोग विद्यार्थी को गलत रास्ते पर ले आता है। यदि इंटरनेट का उपयोग निश्चित समय सीमा और उचित समय पर नहीं किया जाता है तो यह विद्यार्थी की जरूरत से ज्यादा लत बन जाता है जिससे विद्यार्थी पढ़ाई के समय भी इसका थोड़ी - थोड़ी देर में इस्तेमाल करना चाहता है, जो कि पढ़ाई में बाधा बन जाता है। विद्यार्थी इंटरनेट से अधिक समय तक जुड़ा रहकर अपने कीमती समय को भूल जाता है और वह अपने बर्बाद हो रहे समय की ओर ध्यान नहीं दे पाता। इसके साथ साथ इंटरनेट के बहुत से दुरुपयोग है जो विद्यार्थी को अपनी पढ़ाई का असली महत्व समझने में बाधा बन जाते हैं।
इसलिए हमें चाहिए कि हम अपने विद्यार्थी जीवन में इंटरनेट का सही उपयोग करें। इसके लिए हम एक निश्चित समय सीमा तय करें जिससे अधिक समय तक हम इंटरनेट का उपयोग न करें। ऐसा करके ही हम इंटरनेट का सही सदुपयोग कर सकते हैं।
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शनिवार, 31 दिसंबर 2016

विद्यार्थी जीवन में समय सारणी का महत्व

Posted by बेनामी
प्रिय विद्यार्थियो हमने अपने पिछले पोस्ट में विद्यार्थी जीवन में समय के महत्व के बारे में पढ़ा लेकिन आज हम पढ़ेंगे कि विद्यार्थी जीवन में समय - सारणी का क्या महत्व है। हम इतना तो जानते ही हैं कि हमारे जीवन में समय का कितना महत्व है लेकिन उसी समय का सही इस्तेमाल करने के लिए हमें यह भी जरूरी होता है कि समय को सही ढ़ंग से नियोजित किया जाए। जिसके लिए समय सारणी बेहद जरूरी है समय सारणी बनाकर हम अपनी दिनचर्या को सही ढंग से व्यवस्थित कर सकते हैं। समय सारणी के बहुत से फायदे हैं जिनमें से कुछ को नीचे दर्शाया गया है:-


विद्यार्थी जीवन में समय का महत्व


•समयसारणी से हम अपना प्रत्येक कार्य सही समय पर पूरा करते है।
• हमें अपने प्रत्येक विषय को पढ़ने का पूरा मौका मिलता है।
•पढ़ाई से ऊबते नहीं जिससे पढ़ने में मन लगा रहता है।

•सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि जब भी हम अपना समय बर्बाद करते हैं तो हमें उसका अहसास अवश्य होता है।
ऊपरी बातों के अलावा एक विद्यार्थी के लिए समय सारणी के बहुत से फायदे हैं और जिनका विद्यार्थी जीवन में बहुत महत्व है। समय सारणी हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है जिसे बनाने के पश्चात हमें स्वयं की दिनचर्या उसी हिसाब से व्यवस्थित करनी पड़ती है। समय सारणी के लाभों को खुले तौर से समझें तो, जैसे कि हम अपने दिन के प्रत्येक कार्य की पहले से योजना बनाए होते हैं जिससे हम समयानुसार अपने कार्य को पूरा करने की कोशिश करते हैं। इतना ही नहीं नहीं समय सारणी से विद्यार्थी अपने प्रत्येक विषय को पढ़ने हेतु अलग अलग समय के हिसाब से बांटकर रखता है जिससे प्रत्येक विषय को पढ़ने का मौका मिलता है। ऐसे में विद्यार्थी पढ़ाई से ऊबता नहीं और पढ़ने में मन लगाता है। लेकिन इसका मुख्य रूप से एक बड़ा लाभ यह मिलता है कि जब भी हम अपना थोड़ा सा समय बर्बाद करेंगे तो उसे हम महसूस करेंगे - क्योंकि आपने देखा होगा कि हम अपना बहुत सा समय केवल घर में इधर - उधर घूमने में ही बर्बाद कर देते हैं जिसका हम कोई महत्व नहीं समझ पाते लेकिन समय सारणी हमें उस समय का सदुपयोग करने में मार्गदर्शन देंगी।
हमारे लिए यही बेहतर रहेगा कि हम अपने पूरे दिन की सारणी तैयार करें, यह कोई जरूरी नहीं कि हम केवल अपने पढ़ाई से संबंधित सारणी ही बनाये नहीं बल्कि हमें पूरे दिन में क्या - क्या कार्य किस - किस समय पर करना है इन सब बातों का ब्यौरा तैयार करें। अब बात यह निकलती है कि हम समय सारणी तो तैयार कर लेते हैं लेकिन खुद की दिनचर्या को उस हिसाब से ढ़ाल नहीं पाते अर्थात् सारणी के हिसाब से चलना मुश्किल लगता है, अवश्य ऐसा शुरुआत में सभी के साथ होता है। लेकिन ऐसा हर रोज नहीं होता क्योंकि कि जब हम हर रोज स्वयं को सारणी के हिसाब से ढ़ालने का प्रयास करेंगे तो हमें यह काम बिल्कुल आसान लगने लगेगा। इतना ही नहीं इससे हमारी सम्पूर्ण दिनचर्या में बहुत अच्छा बदलाव भी आयेगा।
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गुरुवार, 29 दिसंबर 2016

विद्यार्थी जीवन में समय का महत्व

Posted by बेनामी
जब समय के महत्व की बात आती है तो हम यह समझ जाते हैं कि बात किसी निश्चित व्यक्ति के लिए नहीं बल्कि हर एक मनुष्य के लिए की जा रही है अर्थात् समय का महत्व सभी के लिए उतना ही है जितना प्रत्येक व्यक्ति के लिए भोजन। यहां किसी व्यक्ति की गरीबी - अमीरी कोई संबंध नहीं रखती। इस बात को हम अच्छे से समझते हैं कि मनुष्य जीवन में समय का कितना महत्व है और यह बात हमें जीवन में बहुत बार सिखाई भी जाती है कि समय अनमोल है, इसलिए समय का पूर्ण और सही इस्तेमाल कीजिये।
लेकिन अब यदि बात की जाये एक विद्यार्थी जीवन की तो उसमें समय का एक - एक क्षण बहुत कीमती होता है तो ऐसे में प्रत्येक विद्यार्थी के लिए बहुत जरूरी है समय के महत्व को समझना और समय के प्रत्येक क्षण का सदुपयोग करना। विद्यार्थी को अपने जीवन में दिन के प्रत्येक हिस्से को एक सही कड़ी में पिरोना बेहद ज़रूरी होता है अर्थात् अपनी दिनचर्या को सही ढंग से व्यवस्थित करना।
समय निरन्तर प्रगतिशील है और यह उन्हीं लोगों से दोस्ती करता है जो समय के साथ चलते हैं समय की इज्जत करते हैं। समय किसी का भी क्षण भर भी इन्तजार नहीं करता और ना ही इसे अमीर से अमीर व्यक्ति भी पैसे के बल पर रोक सकता है। अब यदि बात करें समय के साथ चलने की तो इसका साफ - साफ यही मतलब होगा कि हम अपने समय के प्रत्येक क्षण का महत्व समझें और उसका सदुपयोग करें। यदि इसके विपरीत समय के साथ साथ चलने का मतलब पहनावे,खान-पान,रहन-सहन,और पैसे से माना जाता है तो शायद वह हमारी गलत फहमी होगी क्योंकि ऐसा करके हम यह नहीं ककह सकते कि हम समय का पूर्ण उपयोग कर रहे हैं बल्कि यह तो हमारा केवल ऊपरी मिजाज बदलता दिख रहा है।
इसलिए हमें अपने विद्यार्थी जीवन में समय के साथ चलने के लिए सर्वप्रथम इसके सदुपयोग करने के तौर तरीकों को समझना होगा, हमें अपने प्रत्येक कार्य को सही समय पर करने की एक निश्चित समय - सीमा तय करनी होगी। एक छोटे से उदाहरण के रूप में समझें तो हमारे विद्यार्थी जीवन में आमतौर पर ऐसा होता है कि जब हम पढ़ाई, परीक्षा की तैयारी करतें हैं तो एक बात दिमाग में आ ही जाती है कि अभी तो बहुत समय पड़ा है, बस इतना सोचते ही हम अपनी पढ़ाई को कल पर टाल देते हैं और यह हर रोज चलता रहता है। ऐसे में एक दिन ऐसा आता है कि परीक्षा पास करने के लिए पढ़ना महत्वपूर्ण तो होता ही है लेकिन 'अविलंब' (तुरंत करने योग्य) भी हो जाता है। जिससे हमारे दिमाग पर बोझ बढ़ जाता है और केवल एक प्रश्न कि क्या किया जाए अर्थात् कुछ नहीं सूझता। अब सोचिये यदि हम पहले दिन से अपने काम को कल पर नहीं टालते तो हमारा पढ़ाई और परीक्षा की तैयारी का कार्य केवल महत्वपूर्ण ही रहता न कि अविलंब हो जाता। जिससे हमारे दिमाग पर पढ़ाई संबंधी बोझ परीक्षा के समय भी नहीं बढ़ता क्यों कि हम अपनी सम्पूर्ण तैयारी पहले से करते आ रहे हैं।
इसलिए हमें अपने विद्यार्थी जीवन में समय कितना महत्वपूर्ण है इस बात को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। और आज यदि हम समय की कद्र करते हैं समय का सदुपयोग करते हैं तो आने वाले कल में हमारे पास समय,पैसा और इज्जत सब कुछ होगा। क्यों कि समय सिर्फ अकेला नहीं बदलता बल्कि जो लोग समय के साथ चलते हैं समय उन्हें भी बदल देता है अर्थात महान बना देता है।
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मंगलवार, 27 दिसंबर 2016

विद्यार्थी जीवन और फैशन

Posted by बेनामी
प्रिय विद्यार्थियों यदि बात की जाये एक विद्यार्थी के सुन्दर व्यक्तित्व और सम्पूर्ण विद्यार्थीपन की तो उसमें अनुशासन और मेहनत दो बातें जितना महत्व रखती है उतना ही जरूरी है 'सादगी' से भरा विद्यार्थी जीवन। क्योंकि विद्यार्थी जीवन की सादगी विद्यार्थी के फैशन से शायद ही कोई संबंध रखे । इसलिए हमें अब थोड़ा सा इस बात को गहराई से समझ लेना चाहिए कि सादगी क्या और फैशन क्या?
शायद फैशन से जुड़े इस मुद्दे पर सवाल - जवाब करना आपको थोड़ा भिन्न महसूस हो वो इसलिए क्योंकि आज सम्पूर्ण समाज में फैशन की गूँज है, और दूसरा लोग यह भी मानते हैं कि फैशन के मामले में पीछे रहकर हम समय के साथ नहीं चल पाते। लेकिन सच्चाई यह है कि केवल फैशन ही वह नहीं जो हमें समय के साथ चलाता है। क्यों कि समय के साथ चलने के लिए हमें अपनी अन्दरुनी अच्छाईयों को परखना होगा अपने हुनर को ऊँचा उठाना होगा।
यहाँ बात विद्यार्थी जीवन और उसके रहन - सहन की हो रही है तो इस विद्यार्थी जीवन में हमारा पहनावा जितना सरल और स्वच्छ होगा उतना ही बेहतर है। क्योंकि हम एक विद्यार्थी होकर यदि इन बाहरी चीजों और अपने फैशन पर ज्यादा ध्यान देंगे तो इसका नतीजा क्या होगा हम भी समझ सकते हैं। लेकिन अब हम बात करें सादगी की तो इसका यह भी मतलब नहीं कि हम साफ सुथरे रहना छोड़ दें साफ़ वस्त्र पहनने छोड़ दें अपनी जरूरतों को पूरा नहीं करें नहीं ऐसा नहीं और इस बात का जिक्र इससे पहले भी एक लेख में किया जा चुका है कि जितना स्वस्थ मन जरूरी है उतना ही तन और स्वस्थ तन के लिए सफाई अर्थात् सादगी जरूरी है।
लेकिन अब बात यहां कुछ रुखी सी महसूस होती है कि जब एक विद्यार्थी अपनी सादगी से दूर होकर फैशन के मार्ग पर चल पड़ता है तो इस फैशन का सीधा सा असर विद्यार्थी का पढ़ाई से जो लगाव है उस पर पड़ता है। क्योंकि विद्यार्थी जीवन में जितना फैसन बढता चला जाएगा उतना ही विद्यार्थी पढ़ाई से दूर होने लगेगा। देखिए फैशन एक ऐसी चीज़ है जिसे हम दूसरों की देखा देखी करते हैं चाहे वह अनजाने में भी क्यों न हो। ऐसा इसलिए ताकि हम लोगों को कुछ अलग तरह से प्रभावित कर सकें। लेकिन यह ज्यादा समय तक नहीं चल पाता है क्योंकि ऐसे में हम अपने विद्यार्थी जीवन में पढ़ाई से तो दूर होते चले जाते हैं लेकिन दूसरा यह कि इससे हमारे खर्चे भी बढ़ जाते हैं और ऐसे खर्चे जो फालतू में गिने जाते हैं। हम इस बात से भी नासमझ नहीं कि हमें अपने विद्यार्थी जीवन में भी अपनी और विद्यालय संबंधी जरूरतों को पूरा करना पड़ता है। जिसे हमारे परिवार के सदस्य बहुत मुश्किल से पूरा कर पाते हैं। और यदि हम ऐसे समय में स्वयं को फैशन भरे माहौल में डाल लेंगे तो यह निश्चित ही है कि हमारे खर्चे बढ़ेंगे। और इन बढे खर्चों अर्थात् फैशन के शौंक को पूरा करने के लिए हमें पैसे की कमी खलेगी और जिन्हें पूरा करना हमारा पहला लक्ष्य होगा न कि हम अपनी पढ़ाई को महत्व देंगे। ऐसे में चाहे विद्यार्थी को अपने खर्चे पूरे करने के लिए कैसा भी रस्ता अपनाना पड़े लेकिन वह शौंक पूरे करना अब धीरे धीरे विद्यार्थी की मजबूरी बन चुकी होती है। फैशन में पड़कर विद्यार्थी अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को भूलकर केवल स्वयं को बड़ा साबित करना चाहता है। तो ऐसे में विद्यार्थी की पढ़ाई से बिल्कुल रूचि हट जाती है और वह केवल फैशन रूपी अलग दुनिया में जीना शुरू कर देता है।
इसलिए बहुत जरूरी है कि हम अपने विद्यार्थी जीवन को फैशन से बिल्कुल नहीं जोड़ें और स्वयं को पढ़ाई से पूर्ण रूप से जोड़े रखें क्योंकि कि हमारी असली पहचान फैशन से नहीं बल्कि हमारी अच्छी मेहनत और अपने हुनर से जीवन में ऊँचाईयां छू लेने से बनेगी।
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सोमवार, 26 दिसंबर 2016

विद्यार्थी जीवन में खेलों का महत्व

Posted by बेनामी
प्रिय विद्यार्थियो आज हम इस मुद्दे पर बात करने वाले हैं कि हमारे विद्यार्थी जीवन में पढ़ाई के साथ - साथ खेलों का क्या महत्व है और खेल हमारे विद्यार्थी जीवन में किस हद तक लाभदायक है।
खेल प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का एक हिस्सा है और यह उतना ही जरूरी है जितना शरीर के लिए भोजन। जिस प्रकार शरीर को नई ऊर्जा देने के लिए भोजन की जरूरत पड़ती है उतना ही ऊर्जा और ताजगी खेल शरीर को देते हैं। विद्यार्थी जीवन में मानसिक बोझ और शारीरिक थकान को हलका करने का एक साधन है तो वह है खेल और यह खेल हमारे शारीरिक क्रिया कलापों से जुड़े हो यह बेहद जरूरी है। क्यों कि आज यदि मनोरंजन की बात आती है तो केवल मोबाइल और कम्प्यूटर को मुख्य साधन माना जाता है जिनसे एक अकेला व्यक्ति भी अपना मनोरंजन कर सकता है। लेकिन यह मनोरंजन केवल हमारे दिमागी थकान को कुछ समय के लिए तो दूर कर देते हैं लेकिन इनसे हमें शरीर और मन में जो ऊर्जा मिलनी चाहिए थी वह नहीं मिल पाती है। आपने कभी गौर की हो तो कि जब हम मोबाइल या कम्प्यूटर पर लगातार ज्यादा समय तक लगें रहते हैं तो जैसे ही हम उनसे दूर होते हैं तो हमें कुछ अलग सा महसूस होता है और एक मायूसी सी घेर लेती है जिससे हमारा मन पढ़ाई में भी नहीं लग पाता इसका कारण यही होता है कि हमें अपने दिमाग और शरीर को भी नई ऊर्जा और स्फूर्ति की जरूरत पड़ती है और उसके लिए हमारे शरीर के क्रिया कलापों से जुड़े खेल बहुत जरूरी है । क्यों कि मोबाइल, कम्प्यूटर से हमारे शरीर को वह ताजगी नहीं मिल पाती है। इसलिए खेल हमारे सम्पूर्ण विकास का एक अहम हिस्सा है जिनसे हम अपने दिन भर की थकान को नई ऊर्जा में बदल सकते हैं। इतना ही नहीं खेल हमें अपने जीवन में कर्तव्यों और हमारे अंदरूनी हुनर को हमारे सामने रखते हैं जिनसे हमारे अंदर एक नया जोश नई उमंग पैदा होती है।
आज हम देखते हैं कि प्रत्येक विद्यार्थी अपनी पढ़ाई को लेकर एक मानसिक तनाव से गुजर रहा है इतना ही नहीं वह इस तनाव की वजह से स्वयं को ज्यादा समय तक पढ़ाई से जोड़ भी नहीं पाता है और एक किताबी कीड़ा बना रहता है, जिससे विद्यार्थी एक अलग सा उबाऊपन महसूस करता है जिससे कि एक ही चीज़ को बार बार पढ़ लेने के बाद भी वह दिमाग में नहीं बैठ पाती है। तो इसका साफ कारण हमारी मानसिक थकान ही है। और उस थकान और तनाव को दूर करने के लिए हमें बहुत जरूरी है खेलों से जुड़े रहना। स्वयं के लिए समय का कुछ हिस्सा निकाला जाये जिससे हम अपना मनोरंजन कर सकें और मनोरंजन का मुख्य साधन शारीरिक गतिविधियों से संबंधित खेल ही हो।
इसलिए अंततः यही कहना उचित है कि अवश्य पढ़ाई में खूब कठिन मेहनत की जाये लेकिन अपने शरीर को स्वस्थ और मानसिक विकास के लिए खेलों को भी व्यक्तिगत जीवन में पुर्ण महत्व दिया जाए।
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रविवार, 25 दिसंबर 2016

विद्यार्थी मन का संकोच

Posted by बेनामी

8. मन का संकोच

प्रिय विद्यार्थीयो आज हम इस लेख में पढ़ेंगे कि संकोच क्या है और इसका प्रत्येक व्यक्ति और विद्यार्थी जीवन में क्या , कैसा प्रभाव पड़ता है

संकोच

केवल मानसिक समस्या या फिर यूँ कहें कि मन का भ्रम है। इसे प्रत्येक व्यक्ति अपने मन में जाने - अनजाने में भी पाले रहता है चाहे वह किसी भी रूप में हो । लेकिन मन में संकोच रखकर दूसरे तो क्या हम खुद भी स्वयं को सम्मान नहीं दे सकते। परन्तु यह संकोच है क्या? :-
संकोच - मन में ऐसा वहम जो दूसरों के सामने हमें 'सर' उठाने या 'बोलने' नहीं देता। अर्थात्
•क्या हम दूसरों से नजरें मिलाकर बात कर सकते हैं।
•क्या हम खुद से उच्च स्तर के लोगों के साथ आराम से पेश आ सकते हैं, बिना हिचकिचाहट के।
•क्या हम किसी मेहमान या अजनबी व्यक्ति से पहली बार में अच्छे से मिल लेते हैं बातें कर लेते हैं।
•क्या हम अपने माता - पिता से वो बात आसानी से कह सकते हैं, जिसे बताने में हम शर्मिंदगी और हिचकिचाहट महसूस करते हैं
लेकिन वह बात हमें तन और मन से काफी परेशान कर रही है।

यदि इन सवालों का जवाब हमारे मन से 'हाँ' की बजाय 'नहीं' निकले तो अब हमें इन बातों का कारण पता करना होगा कि ऐसा क्यों होता है? अब सवाल यह कि क्या हमने इन बातों का कारण पता करना चाहा - शायद चाहा होगा लेकिन नहीं पता कर पाये क्यों कि कारण बहुत छोटा बहुत बारीक है - बस यही कि:-
'बंद मन','छोटी सोच' वाला होना और खुले विचारों का ना होना अर्थात् मन में नकारात्मक विचार।
बस इन्हीं छोटे कारणों की वजह से हम दूसरों से खुलकर बात नहीं कर पाते, जब हम किसी उच्च स्तर या नौकरी पेशे वाले व्यक्ति से बातें करते हैं तो हमें हिचकिचाहट महसूस होती है, ऐसा इसलिए क्योंकि हम स्वयं को उस व्यक्ति की तुलना में कम आंकते हैं। लेकिन यह हमारी छोटी सोच है, क्यों कि हो सकता है वह व्यक्ति हमें बहुत अच्छा और महत्व वाला समझता हो अर्थात् उसके मन में बड़पन्न के भाव बिल्कुल भी ना हो
आम तौर पर देखा जाता है कि जब हमारे घर पर कोई मेहमान या अन्य कोई भी व्यक्ति आता है तो हम उससे मिलने से घबराते हैं, या फिर मिल भी लेते हैं तो उससे खुलकर बातें भी नहीं कर पाते और हड़बड़ा जाते हैं। आत्म संकोच की वजह से हम उसे पानी या चाय देने से भी कतराते हैं। हमें यह भी पता होता है कि यदि मेहमान वाजी नहीं की जाये तो हमारी छवि भी खराब होती है। इसके बावजूद भी हम अपने मन में ऐसा वहम पाले रहते हैं जो हमें खुलकर दूसरों के सामने आने नहीं देता।
इसी तरह ही हम अपने माता - पिता से भी अपने मन की बात नहीं कह पाते। बहुत बार हमारे साथ ऐसी बहुत सी घटनाएं घट जाती है जो हमें बहुत परेशान करती है। उदाहरण के तौर पर देखें तो - हम कई बार ऐसी आदत या बीमारी से ग्रस्त हो जाते हैं। लेकिन उसे हम शर्म की वजह से माता - पिता को बताने की बजाय झेलते रहते हैं - जब कि एक दिन हमें उस बूरी लत या बीमारी की वजह से शारीरिक,मानसिक और आर्थिक सभी तरह से नुकसान उठाना पड़ता है। हम यह जानते भी हैं कि यदि हमारी प्रत्येक समस्या के बारे में माता - पिता को बताया जाए तो वे अवश्य हमारी मदद करेंगे। लेकिन आत्मग्लानि एवं संकोच की वजह से हम ऐसा नहीं कर पाते क्योंकि हमारे मन में इन बातों के प्रति नकारात्मक विचार चलते रहते हैं।
अब यही बात एक विद्यार्थी पर लागू होती है कि यदि विद्यार्थी कक्षा में किसी प्रश्न या अध्याय के समझ न आने पर अध्यापक से दुबारा न पूछे और इस संकोच की वजह से -(कि साथी क्या कहेंगे) ' चुप बैठा रहे तो वह कैसे आगे बढ़ सकता है।
तो इन सब बातों का मतलब यह कि हम शायद गलत नजरिया रखते हैं। स्पष्ट शब्दों में कहें तो हम 'खुले मन' और 'खुले विचारों' वाले नहीं हैं। इसलिए कोशिश करें कि आज से हमें 'खुले मन','खुले विचारों','सकारात्मक सोच' और सुन्दर स्वभाव वाला इंसान बनना है।
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विद्यार्थी का भय से उत्पन्न बहाना

Posted by बेनामी

7. बहाना मतलब - भय

प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में सबसे बड़ी समस्या यह रहती है कि जब भी हम किसी कार्य को करना चाहते हैं या अपने लक्ष्य तक पहुँचना चाहते हैं, तो उससे पहले हमारे मन में एक भय उत्पन्न होता है। ऐसा भय जिससे हम अपने कार्य/लक्ष्य को शुरू से टाल देने का कोई बहाना ढूंढ लेते हैं और कार्य को किये बगैर ही उस बहाने का मनन कर कर के स्वयं को संतुष्टि दिलाना चाहते हैं। लेकिन क्या कभी आपने सोचा इसके पीछे कारण क्या है। इसके प्रमुख रूप से दो कारण होते हैं -
1. 'या तो हमने काम करने का फैसला सच्चे और शांत मन से नहीं लिया।'
2. 'या फिर हम इस बात से डर गए कि लक्ष्य पाने में बाधायें आयेगी और हम असफल हो जायेंगे।'
बस इन्हीं कारणों की वजह से हमें अपना लक्ष्य कठिन की बजाय बहुत कठिन लगने लगता है यही वजह रहती है कि हम अपने किसी भी कार्य को शुरू नहीं करना चाहते। और उसे न कर पाने के बहाने बनाने में बैठ जाते हैं। जैसे:-
- मैं यह नहीं कर सकता
- मैं बीमार हूँ या/ बीमार पड़ जाऊँगा
- यह बहुत कठिन है
- मुझे यह करना नहीं आता

इन जैसे नए - नए बहाने बना लेते हैं और एक भय की वजह से यह बहानेवाजी हमारे न करने पर भी मन में चलती रहती है। कई बार तो हम ऐसे घटिया बहाने बनाते हैं, जो दूसरों के सामने हमारे मुँह से शोभा तक नहीं देते और इन्हें सुनकर सामने वाला भी शर्मिंदगी महसूस करता है। लेकिन एक खास बात यह है कि किसी कार्य को टालने के लिए हम बहुत आसानी से सैकड़ों मनघड़ंत बहाने बना लेते हैं। लेकिन एक भी कारण ऐसा नहीं खोजते जिससे हम उस कार्य को करना जरूरी समझें। ऐसा इसलिए क्योंकि असफल होने का डर मानसिकता को घेरे रहता है।
बिल्कुल यही कहानी हमारे विद्यार्थी जीवन से जुड़ी है अर्थात जब हमें अपना कोई पढ़ाई संबंधी विषय कठिन लगता है या पढ़ने में रुचि नहीं है तो अवश्य हम कोई ना कोई ऐसा बहाना ढूंढ ही निकालेंगे जिससे हमें वह विषय पढना न पड़े। कहने का मतलब हम जिस विषय,कार्य से डरते हैं या कठिन मान लेते हैं तो आम तौर पर हम ऐसे बहाने बनाते हैं:-
- मेरे पास इस विषय की पुस्तक नहीं।
- मुझे पाठ्यक्रम का पता नहीं।
- आज पढ़ने का मन नहीं।

अन्य भी कई प्रकार के बहाने, लेकिन हम यह नहीं जानते कि ऐसा करके हम स्वयं के भविष्य को खराब करने में लगे हैं। हम इस बात को भी अच्छे से जानते हैं कि हमें एक न एक दिन अपने प्रत्येक कार्य को स्वयं ही निपटाना पड़ेगा। अर्थात् हमें उस विषय को भी पढ़ना पड़ेगा जिसे हम कठिन मानते हैं, हमें अपने प्रत्येक कार्य/लक्ष्य को पाने के लिए कठिन मेहनत करनी होगी। क्योंकि उसके बिना भी हमारा सफल होना संभव नहीं है।
इसलिए हमें चाहिये कि हम कठिन से कठिन कार्य को भी अपना लक्ष्य बनायें और अपने लक्ष्य में असफल हो जाने के भय से दूर रहकर ऐसी वजह खोजें जिससे उस कार्य को हम रुचि लेकर करना चाहें और कठिन मेहनत करें। ऐसे में हमें कोई भी कार्य कठिन भी नहीं लगेगा और कार्य को आनंद के साथ करेंगे जिससे हम अवश्य जीवन में सफल भी होंगे।
। इसकी पक्की गारंटी है

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शुक्रवार, 23 दिसंबर 2016

विद्यार्थी जीवन और तंदुरुस्ती

Posted by बेनामी
6. सुस्त नहीं, चुस्त बनें
हम इस बात को अच्छे से जानते हैं कि 'आलस्य' मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी बुराई है अर्थात कमज़ोरी है। लेकिन यह हमारे विद्यार्थी जीवन में बहुत हद तक नुकसानदायक साबित होता है क्योंकि कि आलस्य आशा को निराशा में और सफलता को असफलता में बड़ी आसानी से बदल देता है। इतना ही नहीं आलसी बने रहकर हम अपने लक्ष्य के करीब पहुँचकर भी उसे पाने में असमर्थ रहेंगे। ऐसे में हम अपने जीवन को सफलता की ओर ले जाने में भी नाकाम साबित होंगे और स्वयं को परेशानी में भी डाल देंगे। जरा सोचिये यदि कोई व्यक्ति आलसी है और खाली बैठा है तो इसका यह तो मतलब नहीं कि वह चिंता से मुक्त है। नहीं बल्कि आलस्य में खाली बैठा व्यक्ति अपनी ओर चिंता को अधिक आकर्षित करता है - क्योंकि जब भी हम आलस्य के कारण खाली बैठते हैं तो हमारा दिमाग हमेशा शैतान बना रहता है। जिस वजह से दिमाग नकारात्मक बातों को अधिक सोचता है, जो हमारे व्यक्तिगत जीवन में चिंता का कारण बन जाती है। जो हमें पूर्ण रूप से जकड़ लेती है और जीवन में उबरने से रोकती है। ऐसे समय में हम अपना कोई भी कार्य समय पर और पूर्ण संतुष्टि से नहीं कर पाते।

यदि हम गहराई से सोचें तो यह साबित होता है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने तन की बजाय मन से अधिक आलसी होता है। हमारी यह आलसी मानसिकता ही है जो प्रत्येक कार्य में बाधा बनकर हमारे कार्यों को कल पर टाल देती है। इसलिए इस आलसी मानसिकता को दूर करने के लिए हम थोड़ा सा तंदुरुस्त मन से सोचें कि मुझे आलसी नहीं बनना आलस्य नहीं करना और स्वयं को चुस्त रखने की मंशा बना लें तो अवश्य हम अपने कार्य को समय के साथ पूरा करेंगे और सफल भी होंगे।
परन्तु इसके लिए चाहिए कि हम स्वयं को प्रत्येक समय अच्छे अच्छे कार्यों में व्यस्त रखें, अपनी दिनचर्या का ध्यान रखें। साथ ही अपने खाली समय का सदुपयोग अच्छी पुस्तकें, पत्र- पत्रिकाएं पढ़कर करें। इसके साथ साथ हम उन कार्यों को सर्वप्रथम पूरा करने की योजना बनायें जो हमारे लिए बेहद जरूरी है। और उन कार्यों को समय पर पूरा करें तो हम बहुत हद तक आलस्य को त्याग सकते हैं ।
"यदि हम प्रत्येक कार्य को कल पर टालते रहेंगे
तो हम दूसरों से हर रोज एक दिन पीछे रहते चले जायेंगे ।
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गुरुवार, 22 दिसंबर 2016

विद्यार्थी जीवन और दोस्ती का महत्व

Posted by बेनामी
5. विद्यार्थी जीवन और दोस्ती का महत्व
आज हम बात करेंगे कि दोस्ती क्या है और इसका प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में कितना महत्व है
हम सभी यह अच्छे से जानते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में 'दोस्ती' कितनी अहमियत रखती है। प्रत्येक रिश्ते में दोस्ती भी जीवन का एक अभिन्न अंग है। लेकिन क्या हम जानते भी हैं कि दोस्ती क्या है? अधिकतर लोगों की दोस्ती का मतलब किसी अन्य व्यक्ति के साथ हाथ मिलाने उनके साथ मौज - मस्ती करने या फिर अपना मतलब पूरा करने तक सीमित है। ऐसे में ज्यादातर लोग दोस्ती के इम्तिहान में फेल भी हो जाते हैं, क्यों कि दोस्त बनाने और दोस्ती निभाने में बहुत समझदारी चाहिए।
"आसान काम है हर किसी को दोस्त कहना, लेकिन बड़ा मुश्किल है दोस्ती निभाना"
आम तौर पर हम देखते हैं कि हम दोस्तों के बीच छोटी - छोटी बातों पर झगड़ा हो जाता है और बात इतनी बढ़ जाती है कि हम एक - दूसरे के भला बुरा कहकर दोस्ती का अंत कर देते हैं, और एक दूसरे के दुश्मन बन बैठते हैं। देखिए दोस्तों के बीच मामूली सा झगड़ा या बहस होना कोई बड़ी बात नहीं ऐसा हो भी जाता है, ऐसे समय में यदि हम गुस्से की बजाय समझदारी से काम लें तो हमारे लिए बेहतर रहेगा - अन्यथा हमारी दोस्ती के दुश्मनी में बदलने में समय नहीं लगेगा। इसका यही कारण कि अब तक हमने दोस्ती का मतलब नहीं और न ही इसे सीखा - बस इसी वजह से हमने दोस्ती की शुरुआत देर से की और इसका अंत जल्दी हो गया।
स्पष्ट रूप में कहा जाए तो मतलब यह कि हमें दोस्ती की शुरुआत अपने माता पिता और परिवार के सदस्यों से करनी चाहिए थी उनसे दोस्ती का मतलब, महत्व सीखना चाहिए था परन्तु ऐसा नहीं हुआ और हम दोस्ती बनाने की बजाय उसे निभाने में असफल हुए।
सही नजरिये से देखें तो हमारे माता - पिता ही हमारे सबसे सच्चे दोस्त हैं - इसलिए क्योंकि दोस्त वही है जो दूसरों के प्रति भलाई चाहते हों जो दूसरों पर सच्चा विश्वास करते हों और हमेशा सुख दुख के साथी हो। इसका सच्चा और बेहतर उदाहरण माता - पिता के अलावा शायद ही कोई हो। क्यों कि माता पिता ही हैं जो सर्वप्रथम सुख - दुख में हमारा साथ देते हैं। माता - पिता यदि किसी बात से हमसे गुस्सा भी है तो भी उनके दिल में हमारी कामयाबी की दुआ हमेशा रहती है। माता पिता की डांट फटकार में भी इतनी शक्ति है कि वो हमें जीवन में सच्चे और कामयाबी के रस्ते पर ले जाती है। लेकिन उसके लिए हमारी सहनशक्ति बहुत जरूरी है।
अन्ततः यही कहना सही है कि हमें अपने माता पिता से दोस्ती का महत्व और मतलब सीखना होगा।
"यदि हम दोस्ती की शुरुआत माता - पिता से करेंगे
तो हम जीवन में यही पायेंगे कि हमारी दोस्ती किसी
पुरुष - महिला, अमीर - गरीब की बजाय"इंसान" और उसकी "इंसानियत" से हो रही है।
।
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बुधवार, 21 दिसंबर 2016

विद्यार्थी जीवन में ईमानदारी एक बड़ा गुण

Posted by बेनामी
4. विद्यार्थी जीवन में ईमानदारी एक बड़ा गुण
प्रिय विद्यार्थीयो पिछले लेख में हमने विद्यार्थी जीवन में अनुशासन के महत्व के बारे में पढ़ा तो आज हम प्रत्येक व्यक्ति के एक सुंदर गुण 'ईमानदारी' के बारे में चर्चा करेंगे लेकिन इससे पहले हम यह भी जान लें कि प्रत्येक व्यक्ति को जीवन में कुछ ना कुछ सीखने के लिए एक शिष्य बनना पड़ता है,और हम अपने विद्यार्थी जीवन में ईमानदारी के मार्ग से जुड़े रहें - इसलिए लेख की शुरुआत विद्यार्थी शब्द से करना उचित रहेगा:-
चालाक शब्द का बुद्धि से शायद ही कोई वास्ता हो। यदि कोई व्यक्ति यह कहता है कि आज भलाई का समय नहीं रह गया है, अब तो चालाकी और बेईमानी करने में ही फायदा है - तो ऐसा कहने वाला व्यक्ति शायद टूटी- फूटी इंसानियत वाला हो। ऐसे व्यक्ति हमेशा दर्पण को धंधला बताते हैं, इन्हें नहीं मालूम होता कि धूल चेहरे पर भी जमी हो सकती है। यदि कोई व्यक्ति स्वयं को चालाक समझकर बेईमानी का रास्ता अपनाने लगे और स्वयं को महान समझे तो वह इस बात से अनजान है कि गलत काम का नतीजा हमेशा गलत ही होता है। और एक न एक दिन स्वयं द्वारा खोदे गए बेईमानी के गढ़ो में फिसलने में समय नहीं लगता।
यदि आपने कभी गौर की हो तो जीवन में ऐसी छोटी - छोटी घटनाएं जो हमें पूर्णतः ईमानदार बनने का मौका देती रहती है। जैसे आपने देखा होगा जब हम दूध आदि में पानी डालकर बेचते हैं तो कई बार उसी क्षण या कुछ समय बाद दूध के खराब हो जाने या जमीन पर बिखर जाने जैसी घटना घट ही जाती है। यही नहीं ऐसे छोटे - बड़े बहुत से उदाहरण हमारे जीवन में होते रहते हैं - जो किसी न किसी रूप में हमें अपनी गलती का अहसास करवाते हैं।
लेकिन अब यदि हम ऊपर लिखे मिथ को नहीं मानें फिर भी हमें कोशिश करनी चाहिए कि हम इन बातों को नजरअंदाज ना करें और इनसे सीख लेने की कोशिश करें। इसलिए हमें यही समझना चाहिए कि भगवान हमें ऐसे मौके जिन्दगी में सुधार करने और ईमानदार बनने के लिए देता है। यदि हम जान बूझकर भी ऐसा करते रहें तो एक दिन हमें बड़ा नुकसान झेलना पड़ता है।
एक ईमानदार व्यक्ति बनकर हम समाज में प्रत्येक व्यक्ति का दिल जीत सकते हैं। लेकिन ईमानदारी हमारे तन - मन में पूर्ण रूप से भरी हो । ऐसा न हो कि हम केवल ईमानदार बनने का दिखावा करते रहें और हमारे मन में दूसरों के लिए कूट भावना भरी हो। क्योंकि बुद्धिमान लोगों का मानना है कि झूठ और बेईमानी बिना पांव के होती है जो एक न एक दिन सामने आ ही जाती है और यह सच भी है।
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विद्यार्थी जीवन में अनुशासन का महत्व

Posted by बेनामी
3. विद्यार्थी जीवन में अनुशासन का महत्व
प्रिय विद्यार्थीयो आज हम बात करने जा रहे हैं कि प्रत्येक व्यक्ति और विद्यार्थी के जीवन में अनुशासन का क्या महत्व है और अनुशासन क्या है अधिक से अधिक शिक्षा प्राप्त कर लेने के पश्चात् भी हम यह नहीं कह सकते कि हम अनुशासन से परिपूर्ण हैं अर्थात् शिक्षा हमें केवल अनुशासन के लिए प्रेरित कर सकती है। और अनुशासन जितना शिक्षित व्यक्ति के लिए जरूरी है उतना ही अशिक्षित व्यक्ति के लिए भी अर्थात् प्रत्येक मनुष्य जीवन के लिए अनुशासित होना अत्यंत जरूरी है:-
"अनुशासन वह पौधा है जिसके 'अच्छे व्यवहार' और 'अच्छे नजरिये' नामक
दो फूल हमेशा खीले रहते हैं"

अनुशासन सीखने के लिए हमें न तो अच्छे आभूषणों एवं वस्त्रों की जरूरत है न ही किसी दवा - दारु की। बल्कि अनुशासन सीखने का पहला कदम यही होगा कि हम स्वयं की गलतियों को करें और उनमें सुधार करें साथ ही अपने कर्तव्यों का पालन करें। एक बड़ा और सफल व्यक्ति भी बिना अनुशासन के समाज को अपनी ओर आकर्षित करने में नाकाम साबित होता है। दूसरी तरफ क्या कोई विद्यार्थी कक्षा में पढ़ाई के समय ऊछल - कूद करता अच्छा दिखेगा, जब वह गलत शब्दों का इस्तेमाल करे, अध्यापक एवं विद्यार्थीयों के साथ गलत व्यवहार करेगा तो अच्छा लगेगा? बिल्कुल नहीं - कुछ समय बाद ही उसकी घटिया हरकतें लोगों में 'मखौल' उड़ाने लायक बन जायेगी। परन्तु यही है जो प्रत्येक छात्र या व्यक्ति के अनुशासित जीवन की नींव है अब वह अच्छी है या बुरी यह स्वयं के व्यवहार पर निर्भर करती है।
अब इन सभी बातों से हटकर एक बात यह भी है कि कई बार हम स्वयं को घर या स्कूल में तो पूर्णतः अनुशासित रखते हैं चाहे वह हमारा व्यवहार हो या फिर हमारी वाणी। परन्तु जब हम कहीं बाहर जाते हैं या दोस्तों के साथ घूमने जिले हैं तो वहां अनुशासन भूल जाते हैं, तो इसका साफ मतलब यह हुआ कि हम घर में केवल डर - भय के कारण ही अनुशासन में रहते हैं जबकि वास्तव में हमारे अंदर अनुशासन नामक गुण की कमी है, तो ऐसा करके हम दूसरों की बजाय स्वयं को धोखा देने में लगे हैं।
इसलिए अन्ततः यही कहना ठीक रहेगा कि हम स्वयं की आदत अनुशासन में रहने की बनायें, अनुशासन का महत्व समझें उसे सीखें और अपने जीवन में उतारें।
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मंगलवार, 20 दिसंबर 2016

विद्यार्थी जीवन और अच्छा रहन - सहन

Posted by बेनामी
2. विद्यार्थी जीवन और अच्छा रहन - सहन
हमारा जन्म सिर्फ और सिर्फ अच्छा और सफल जीवन जीने के लिए हुआ है, ऐसा जीवन जो कष्टों, दुखों में काटने की बजाय कुशल और जीने की तमन्ना से भरा हो। लेकिन ऐसा जीवन तभी संभव है जब हमारा रहन- सहन, आदतें और माहौल अच्छा हो ऐसे में सफल जीवन के आनंद और भी अच्छे हो जाते हैं।
जी हाँ यहाँ बात की जा रही है हमारे व्यक्तिगत रहन - सहन हमारी आदतों और हमारे आसपास के माहौल की अर्थात् हम कैसा जीवन व्यतीत कर रहे हैं। प्रत्येक व्यक्ति का अच्छा रहन - सहन अच्छी आदतें ही लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है। लेकिन अच्छी आदतें और रहन- सहन निर्भर करता है हमारे आसपास के माहौल पर - जैसा माहौल वैसा हम स्वयं को ढाल लेंगे, लेकिन यह माहौल जुड़ा है हमारे "नजरिये" से। हमारा रहन- सहन और आदतें अच्छी है तो हमारा नजरिया समाज के प्रति और समाज का नजरिया हमारे प्रति अच्छा ही होगा। और यदि बूरा है तो इसके बिल्कुल विपरीत। देखिये अच्छा रहन - सहन केवल दिखने में अच्छा नहीं बल्कि इससे हमारी आदतें और सोच दोनों का स्तर भी काफी ऊंचा होगा।
सोचिए यदि हम घर से बाहर नंगे पांव या फटे मेले वस्त्र पहन कर निकलें तो हमारी मानसिकता क्या है? और दूसरी बार जूते और साफ वस्त्रों में घर से बाहर जाये तो हमारी सोच क्या है, "यहाँ मतलब मंहगे वस्त्र पहनने से नहीं बल्कि बात की गहराई को समझें"
अर्थात् दोनों जगहों पर हमारा रवैया और व्यवहार दूसरों के साथ अलग अलग होगा चाहे वह दूसरों से मिलने में हो या बोलचाल में।ऐसा शायद दूसरी बार में हो क्योंकि वहाँ हमारी सोच ऊच स्तर की है, इसलिए बात यह है कि ऐसा करने के लिए हमें स्वयं के तन की बजाय मन को सुन्दर विचारों से ढकना होगा।
शायद आप अब यह अच्छे से समझ चुके होंगे कि यदि हमारे आसपास या घर का माहौल अच्छा है तो हम दूसरों से प्रत्येक तरह से अच्छा व्यवहार करेंगे और स्वयं की आदतों को भी उसी अनुरूप ढाल लेंगे। जिससे हमारी भावनाएं ऐसी बन जायेगी कि हम चाहेंगे - सम्मानजनक और ऊच्चस्तर का जीवन जीयें और हमारी पहचान अच्छे लोगों में हो । ऐसे में हम कठिन परिश्रम करने को भी तैयार हैं क्योंकि हम अपने जीवन स्तर को गिरता नहीं देखना चाहते। कल्पना कीजिए यदि कोई बच्चा स्कूल से घर आकर अपने स्कूल बैग और कपड़ों को उतार कर सही ढंग से रखने की बजाय उलटा - सीधा, इधर - उधर डाल देता है और वह ऐसा हर रोज करता रहे, और उसे इस आदत को सुधार करने का न कहा जाए, तो यह एक दिन उसके जीवन की बड़ी कमजोरी बन जायेगी
इसी प्रकार यदि कोई "व्यक्ति" ऐसे"व्यक्ति" के सम्पर्क में रहे जो नशा करता हो जिसकी जुबान पर भद्दे शब्द हर समय रहे और वह समाज को घटिया बताता हो, तो क्या वह व्यक्ति भी उस जैसा नहीं बन जाएगा? अवश्य वह स्वयं के रहन - सहन को भी उसी के अनुरूप ढ़ाल लेगा, और उस जैसी आदतों का शिकार हो जायेगा यहाँ तक कि अब उस व्यक्ति की सोच भी वहां तक सीमित रहेगी।
दूसरी तरफ आप कल्पना कीजिए यदि हमारी दोस्ती या सम्पर्क ऐसे व्यक्ति के साथ हो - जिसका रहन- सहन अच्छा है और दूसरों से बहुत ही मिलनसार व्यवहार करने वाला हो और अपनी लगन मेहनत से वह व्यक्ति गरीबी से अमीरी के रस्ते पर चल पड़ा हो, तो क्या हम भी स्वयं को उस जैसा नहीं बनाना चाहेंगे। 'अवश्य' अब तो हम साथ रहकर उस जैसे बन भी जायेंगे क्योंकि उसके साथ रहकर हमारी आदतें स्वतः ही अच्छी होती चली जायेगी। ऐसे व्यक्ति का साथ पाकर हम कोई गलत कदम उठाने में शर्मिंदगी महसूस करेंगे। अब हम उस जैसा नेक और पैसे वाला बनने के लिए मेहनत भी करेंगे और ऐसे व्यक्ति के सम्पर्क में रहने से हमारी सोच उच्च प्रवर्ति की बनेगी जिससे हम हर रोज तरक्की करना चाहेंगे।
और एक दिन अवश्य "सफल" होंगे।

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रविवार, 18 दिसंबर 2016

विद्यार्थी का व्यक्तित्व

Posted by बेनामी
हमें जीवन में बहुत बार यह बात सिखाई जाती है कि हमारा व्यक्तित्व अच्छा हो क्योंकि अच्छे व्यक्तित्व से ही हमारी पहचान सुन्दर इंसान के रूप में होती है। लेकिन बात यह है कि एक अच्छा व्यक्तित्व होता कैसा है अर्थात् यह किन गुणों से मिलकर बनता है।क्या एक अच्छे व्यक्तित्व का महत्व विद्यार्थी जीवन में भी है,और है तो कितना है? तो इन सब सवालों का जवाब हमें आगे की बातें (लेख 1से8.)पढ़ने पर आसानी से मिल जाएगा। शायद ये बातें पढ़ने में बिल्कुल सामान्य लगे परन्तु हमें जरूरत है इन विषयों की गहराई में जाने की तभी हम इनका महत्व समझ पायेंगे -
1. -:विद्यार्थी की बोलचाल :-
उस व्यक्ति की सराहना करने से शायद ही कोई चूके जिस व्यक्ति की वाणी में मधुरता हो, वहाँ गरीबी -अमीरी कोई मायने नहीं रखती। कितना अच्छा महसूस होता है जब कोई व्यक्ति जरूरत के अनुसार ही बोलता हो, और उस व्यक्ति का दूसरों के साथ पेश आने का तरीका अच्छा हो। इस गुण से घड़ा व्यक्ति केवल अपने से बड़ों से नहीं बल्कि उम्र में अपने से छोटों से भी बहुत ही नरमी और इज्जत से पेश आता है। प्रत्येक व्यक्ति यही चाहता है कि समाज के लोग उसके साथ सम्मानजनक व्यवहार करे - तो इसके लिए पहले हमें अपने स्वयं का व्यवहार अच्छा बनाना पड़ेगा, हमें अपनी वाणी पर संयम और दूसरों से बातें करते समय सही एवं उचित शब्दों का प्रयोग करना होगा, तो ही ऐसा संभव है। यदि हमारा प्रत्येक व्यक्ति के साथ बोलने का ढंग उचित है तो हमें जीवन में कभी भी पीछे मुड़कर देखने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
मान लीजिए यदि कोई व्यक्ति जरूरत से भी ज्यादा बोले तो न जाने वह कितनी बातें बिना महत्व की और दूसरों के लिए उलटी - सीधी कह देगा। वह नहीं जानता कि ऐसा करना,'सुन्दर फसल के साथ उग आई खरपतवार के समान है, जिस खरपतवार का कोई महत्व भी नहीं है और वह खेत की सुन्दरता को भी नष्ट कर देती है। इसी प्रकार फालतू बोलने का महत्व न तो स्वयं के लिए है ना ही दूसरों के लिये। एक सच्चाई --
कम और मीठा बोलने वाला व्यक्ति हमेशा सुन्दर दिखता है और आनंदमय जीवन जीता है।
लेकिन फिर भी कुछ व्यक्तियों के मन में यह भ्रम बना रहता है कि यदि वो कम बोलेगा तो दूसरे उसका मजाक बनायेंगे। तो आइये इस भ्रम को दूर कर लेते हैं - यदि हम जरूरत के अनुसार और मीठा बोलते हैं तो हमें जीवन में "तीन तरह" के 'लोग' मिलेंगे और उनका नजरिया इस प्रकार होगा:-
1•वह व्यक्ति कम ही बोलता है, लगता है 'भोला' या 'मन्दबुद्धि' है।
2•वह व्यक्ति जितना पूछा जाए उतना ही बोलता है, ना जाने उसे किस बात का 'घमंड' है।
3•वह व्यक्ति बहुत अच्छा है, क्यों कि वह जरूरत से अधिक नहीं बोलता।

लेकिन यदि हम लोगों की गलत भावनाओं का शिकार न होकर हमेशा कम और अच्छा बोलने वाला स्वभाव बनाये रखें तो अंततः हमें "तीसरी तरह" के यानी कि सराहनीय लोग ही मिलेंगे। और समाज में हमारी पहचान सम्मानजनक व्यक्ति के रूप में होगी।
अब हमें इन बातों को सकारात्मक और स्पष्ट रूप में समझना जरूरी है अर्थात् यहाँ बोलने को गुनाह नहीं माना गया है बल्कि इस बात का स्पष्टीकरण दिया गया है कि हम जो दूसरों से बातें करते हैं उनमें किस हद तक सच्चाई और श्रेष्ठता है। और कहीं हमारी उन बातों और वाणी से किसी अन्य व्यक्ति को ठेस तो नहीं पहुंच रही है।
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